शनिवार, 4 मार्च 2017

काँटों में गुलाब : लघुकथा

गुलाब के पौधे पर कलियों के बीच एक फूल को झूमते देख मार्था के गुलाबी होठ लरज़ उठे। वह उसे बरबस निहारने लगी। तभी एक लड़का जो मार्था के यहाँ पेइंगगेस्ट था वहाँ आ पहुँचा।
“मैडम, क्या मैं यह गुलाब ले सकता हूँ?” मार्था अचकचा गई। उसने लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर शरारत भरे अंदाज़ में पूछा, ‘‘गर्लफ़्रेण्ड के लिए?”
फिर थोड़ा ठहर कर बोली, “जा ले ले, और देखना कोई काँटा न साथ चला जाय।”
“जी, शुक्रिया!” लड़के ने फूल लेकर अपनी साइकिल के हेंडल में खोंसा और पैडल मारते हुए आगे बढ़ गया। मार्था स्नेहिल निगाहों से उसे जाता हुआ देखती रही।
“आंटी, आपने उसे गुलाब क्यों ले जाने दिया? कितने दिनों से आप उसके खिलने का इंतज़ार कर रही थीं?” यह दीपा थी, मार्था की दूसरी पेइंगगेस्ट।
“ गर्लफ़्रेण्ड के लिए ले जा रहा है ना।”
“तो खरीद कर ले जाता ना, कंजूस कहीं का!”
“नहीं दीपा, लगता है...यह भी पीटर की तरह...हालात से लड़ रहा है,” कहते हुए मार्था ने एक गहरी साँस छोड़ी।
“पीटर?” दीपा की निगाहों ने प्रश्न उछाला।
“मेरा बॉयफ़्रेण्ड। एक दिन जब उसने मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो...”
** “मार्था, अभी मेरी ज़िंदगी में सिर्फ़ काँटे हैं...इस टहनी की तरह...संभव है उसमें कभी फूल न भी आएँ। क्या तुम मुझसे शादी करना चाहोगी?”
“पीटर, मैं तुमसे बेहद प्यार करती हूँ...पर क्या हम थोड़ा और इंतज़ार नहीं कर सकते, तुम्हारे सेटल होने तक?”
**
“दीपा यह गुलाब का पौधा वही टहनी है जिसे उस दिन पीटर ने यहीं डाल दिया था, लेकिन...”
“लेकिन क्या आंटी?”
“लेकिन उस दिन के बाद से पीटर मुझे कभी नहीं मिला। मैंने उसका बहुत इंतज़ार किया। फिर हेनरी से मेरी शादी हो गई। उसने मेरी ज़िंदगी को गुलाबों से भर दिया। लेकिन उनके बीच जो काँटे थे उन्हें मैं पहचान न सकी। शादी के कुछ साल बाद ही उसने मुझे डिवोर्स देकर एक बिजनेसमेन की बेटी से शादी रचा ली।”
“ओह...वेरी सेड, आंटी...” थोड़ा सोचकर दीपा बोली, “फिर तो उस लड़के को भी अपनी गर्लफ़्रेण्ड को गुलाब नहीं देना चाहिए?”
“दीपा, ये प्रपोज़ल का समय भी ना बहुत नाज़ुक होता है। एक हल्की सी धमक भी दिल को चकनाचूर कर देती है। मैंने पीटर से जो कहा वह ग़लत नहीं था, बस उसे कहने का वक़्त ग़लत था।”
“ह्म्म्म...लेकिन यह लड़का अगर संघर्ष में नाकामयाब रहा तो फिर तो उसकी गर्लफ़्रेण्ड के साथ धोखा हुआ ना?”
“ऐसा नहीं होगा दीपा, हमारा समय और था...आज की पीढ़ी में जूझने का जज़्बा है। अब तो लड़का-लड़की दोनों मिलकर अपने भावी जीवन की योजनाएँ बनाते हैं।”
“ओहो...थैंक यू आंटी!” दीपा थोड़ा सोचने लगी, फिर बोली, ”....अच्छा आंटी मुझे भी जाना है।”
“अरे आज तो छुट्टी थी...फिर तुझे कहाँ जाना है?”
“आंटी...आज प्रपोज़ल एक्सेप्ट करने का दिन है!” खिलखिलाती हुई दीपा भी उसी ओर चल पड़ी जिस ओर वह लड़का गया था।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

टिप्स : लघुकथा

आज निक्की की हल्दी है। कमरे में साड़ियों के पैकेट बिखरे पड़े हैं। कुछ औरतें उन पर नामों की पर्चियाँ लगा रही हैं कि कौन सी साड़ी किसे देनी है। कुछ औरतें जो रिश्ते से निक्की की भाभी लगती हैं वे बीच-बीच में उसको ससुराल के नाम से छेड़ती भी जा रही हैं।
एक ने निक्की के गाल पर हल्दी लगाते हुए कहा, “ससुराल में क्या करना है क्या नहीं हमसे टिप्स लेती जाओ बन्नो रानी, फिर देखना राज करोगी राज।”
“टिप्स नम्बर एक, पहले दिन से ही काम करके अपनी सुघड़ता का परिचय मत देने लग जाना, वरना कामवाली ही बनकर रह जाओगी।” एक ने कहा।
“हाथ में मेहँदी चढ़ी रहने तक बिना कहे एक चम्मच भी ना धोना, वरना जिन्दगी भर के लिए हाथों से बर्तन मांजने का जूना लिपटा रहेगा...टिप्स नम्बर दो।” दूसरी बोली।
“शुरू में ही सास को पैर दबाकर सुलाने की आदत तो मती डारियो...बता देते हैं हाँ।” यह तीसरी बोली।
“और अगर ननदों को अपना मेकप-शेकप सिर चढ़ाया तो समझ लो हाथ से गयी सिंगार पेटी।” चौथी ने बात जोड़ी।
“एक बात और जो तेरी खास साड़ियाँ हैं उन्हें अभी मत ले जा, कहीं सासू माँ का दिल आ गया तो उनसे हाथ धो बैठेगी सो अलग, उम्र भर नया पहनने को तरस जाओगी।” पाँचवी ने नज़दीक आकर कहा।
निक्की उनकी बातें सुनकर पहले तो मुस्कुराई। फिर बोली, “भाभी, आप लोग तो मुझे ऐसे समझा रही हो जैसे मुझे ससुराल नहीं किसी जंग में जाना है।”
“ये लो कर लो बात, ये जो ससुराल के खबसूरत खाब सजाए बैठी हो न बिल्लो, पहुँचोगी तो पता चलेगा।”
“मुझे डरवा रही हो भाभी।”
“अरे हम क्यों डरवाने लगे, होता ही ऐसा है, सो वही समझा रहे हैं।”
“भाभी अभी जिसको ठीक से जाना नहीं उसके लिए ऐसी राय बना लेना क्या ठीक है?”
“ओहो, बन्नो रानी तो अभी से ससुराल के सुर में बोलने लगीं।”
“क्यों भाभी, आख़िर वह भी तो मेरा ही घर होने वाला है।”
तभी पास पड़े निक्की के मोबाइल पर एक नम्बर चमका। उसे देख निक्की के चेहरे पर लालिमा युक्त मुस्कान तिर आयी। उसने पास बैठी उन औरतों में से एक को हाथ में लगी हल्दी दिखाते हुए फ़ोन रिसीव कर उसके कान से लगाने को कहा। हाव-भाव देखकर वह औरत शायद समझ गई कि फ़ोन निक्की के ससुराल से है। इसलिए उसने फ़ोन रिसीव कर स्पीकर ऑन कर दिया।
पहले तो निक्की थोड़ा सकपकाई फिर स्पीकर ऑन पर ही बोलने लगी, “हेलो माँ! प्रणाम!”
“खुश रहो, क्या हो रहा है?”
“बस अभी हल्दी लग रही है...तो...”
“ओह्हो, गलत समय फ़ोन कर दिया...अच्छा सुन कुछ वेस्टर्न ड्रेसेज़ भिजवा रही हूँ ट्रायल के लिए जो-जो पसंद आये रख लेना...ठीक है...फ़िर बाद में फ़ोन करती हूँ...”
“जी माँ...!”
फ़ोन कट गया। निक्की ने कमरे में बैठी औरतों पर एक सरसरी निगाह डाली। थोड़ी देर पहले जहाँ टिप्स का शोर गूँज रहा था, अब वहाँ सुई पटक सन्नाटा छाया हुआ था।
उसने माहौल को थोड़ा हल्का बनाने के लिए चुटकी ली और मुस्कुराते हुए बोली, “हाँ भाभियों, तो अगली टिप्स?”
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(चित्र गूगल इमेज से)

रविवार, 22 जनवरी 2017

कोहरा : लघुकथा

कोहरा छंट गया था। वातावरण में ठण्ड की चुभन बरकरार थी। रफ़्ता-रफ़्ता नुक्कड़ पर लोगों की आवा-जाही शुरू हो गई थी। हमेशा की तरह भोला के ढाबे पर चाय के तलबगारों का जमावड़ा जुटने लगा था। उसके सामने लैंपपोस्ट के खम्भे के नीचे बेरवाली भी आकर बैठ गई थी। अपने आस-पास पड़े रैपरों व पोलीथीन की थैलियों को जलाकर वह अपनी ठिठुरती उंगलियाँ सेंकने की कोशिश कर रही थी।
उधर सुरतिया चार-पाँच रोज़ से बुखार में बेसुध पड़ी थी। आज थोड़ा होश आया तो नंदू की चिंता सताने लगी। खटोले पर लेटे-लेटे धोती के पल्ले से पाँच का सिक्का खोल कर नंदू को थमाते हुए कहा, “जा नुक्कड़ से कुछ खरीदकर खा ले।”
“अम्मा थोड़े और पैसे दे ना, आज इमरती खाने का बड़ा मन कर रहा है।” नंदू ठुनका।
“अकेल्ली यही पंजी बची है बिटवा...एतने रोज से काम पर नहीं गए...” आँखों को ढपते हुए सुरतिया ने समझाया।
नंदू साइकिल का टायर लुढ़काते नुक्कड़ की ओर चल पड़ा। बेरवाली की अभी तक बोहनी नहीं हुई थी। वह अभी भी पोलीथिन सुलगा रही थी। बीच-बीच में आवाज़ भी लगाती जा रही थी।
“चचा, हमको समोसा चाहिए।” नंदू ने पाँच का सिक्का भोला की ओर बढ़ाते हुए कहा।
“पाँच में समोसा नहीं मिलता...क्यों सुबह-सुबह बोहनी का टाइम खराब करता है।” भोला ने नंदू को प्या‍र से डपटा। नंदू रुआँसा हो गया। वह ढाबे में तले जा रहे समोसे और जलेबियों को बड़ी हसरत से देखने लगा।
“लेओ मीठे-मीठे बेर!” बेरवाली ने फिर आवाज़ लगाई।
उसकी आवाज़ सुनकर नंदू उसे देखने लगा। उसकी नज़र सुलगते रैपरों पर पड़ी। वह उसके पास जाकर खड़ा हो गया। चिट-चिट कर जलते रैपरों को देख कर वह मुस्कुराने लगा। शायद उससे उठने वाली रंगीन लपटों के आकर्षण ने थोड़ी देर के लिए उसकी समोसा खाने की इच्छा को भटका दिया था। नंदू ने अपना टायर लपट के ऊपर कर दिया। टायर जलने लगा। आग तेज होने लगी। बेरवाली उसमें अपने हाथ-पैर सेंकने लगी। उसने मुस्कुराकर नंदू को देखा। फिर डलिया से कुछ बेर लेकर नंदू के हाथ में थमा दिया। धीरे-धीरे टायर आग के गोले में बदल गया।
समय की आग में बहुत कुछ बदल गया। भोला का ढाबा काँच के केबिन में बदल गया। उसकी कुर्सी गद्देदार हो गई है। अब वहाँ उसका बेटा बैठता है। लैंपपोस्ट के खम्भे के नीचे अब नंदू सिंघाड़े का ठेला लगाता है। ठेले के ठीक नीचे एक बूढ़ी औरत सिंघाड़ा उबालती है। और कोहरा है कि फिर छा जाता है।

रविवार, 8 जनवरी 2017

बर्फ़ीले दरम्यान :लघुकथा

तुषार ने अचानक एलान किया कि इस बार न्यू इयर पार्टी के लिए उसने अपने बॉस को सपत्नीक निमंत्रित किया है।
“अंकिता, मैं बताना भूल गया था, खाना मैंने होटल से ऑर्डर कर दिया है।’’ सुबह-सुबह तुषार ने कहा।
अंकिता ने उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि डाली, जैसे पूछ रही हो, ‘क्यों?’
“वो क्या है कि...बॉस की बीवी थोड़ा...मतलब ये कि घर-वर का खाना उन्हें सुहाता नहीं है न।’’
“तो उन्हें किसी होटल में ही पार्टी दे देते ? ’’
“हाँ, पर होटल में पार्टी देना जेब को भारी पड़ सकता था।’’
“ठीक है, तो मैं घर व्यवस्थित कर लेती हूँ।’’
“अरे नहीं, तुम रहने दो, मैंने ऑफ़िस के दो वर्कर्स को बुला लिया है, वे आधुनिक साज-सज्जा करने में निपुण हैं, और बॉस की बीवी का मिजाज़ भी खूब समझते हैं।’’
“अच्छा तो फिर मुझे आज क्या करना है,यह बता दो।’’अंकिता ने खीझकर कहा।
“तुम अभी बस चाय बनाओ, और फिर किसी पार्लर में जा कर थोड़ा मेकअप-शेकअप करवा लो...वो..क्या है न कि...।’’
“कि बॉस की बीवी को तुम्हारी देहातन बीवी सुहाती नहीं है न।’’ तुषार की बात पूरी होने से पहले ही अंकिता चिढ़ कर बोली।
“ऐसा नहीं है अंकिता, मैं चाहता हूँ कि तुम किसी बात में कम न लगो, और पहले भी तो तुम पार्लर जाती ही थीं।’’
रोज़मर्रा के काम निपटा कर अंकिता पार्लर पहुँची। शादी से पहले तो तुषार को अंकिता का सजना-संवरना, घर को मेंटेन करने का अंदाज़, उसके हाथ का बनाया खाना, सब कुछ अनूठा लगता था। वही अंकिता आज बॉस की बीवी के आगे फूहड़ लग रही है। लेकिन इसमें तुषार का क्या दोष।
माना कि तुषार की नौकरी के शुरुआती तीन-चार साल संघर्ष में गुज़रे। जिस वजह से उनका हाथ तंग था। किन्तु बाद में तो सब ठीक हो गया था। अपने ऊपर ध्यान देना उसने खुद ही तो छोड़ दिया था। जब कहीं बाहर जाना होता तो वह खुद बच्चों के या काम के बहाने टाल देती थी। तुषार कई बार उसके इस रवैये से दुखी हो जाता था।
“मैडम, आपका मेकअप कम्प्लीट हो गया।’’ पार्लर वाली की आवाज़ उसे वर्तमान में ले आई।
वह आईने के सामने आई तो चौंक पड़ी। उसके सामने जैसे बीस साल पहले वाली अंकिता खड़ी थी। ‘वही नैन-नक्श, वही अदा...कुछ भी तो नहीं बदला था...फिर क्यों वह..?’ अंकिता मन में निरुत्तरित प्रश्न लिए घर की ओर चल दी।
अंकिता घर के अन्दर दाखिल हुई। उसने देखा पूरे घर का नक्शा ही बदला हुआ है। एक बार तो उसे लगा वह किसी और के घर में आ गई है।
“अरे वाह, क्या बात है, आज तो जरूर किसी पर बिजली गिरेगी।’’ तुषार ने उसे देखते ही चुटकी ली।
अंकिता ने तिरछी निगाहों से तुषार को देखा। उसकी आँखों में शरारत थी। लाज से अंकिता के गालों की सुर्खी और बढ़ गई।
“अरे, आपने खाने का ऑर्डर दिया था, उसका क्या हुआ ?” अंकिता ने झेंपकर जैसे बात बदलने की कोशिश की।
“वो भी आ जाएगा, तुम बस इधर आकर बैठो।” तुषार ने उसे खींच कर अपने बाजू में सोफ़े पर बैठा लिया।
फिर वह हौले से उठा। उसने कमरे की सारी लाइट बंद कर दीं। अब मोमबत्तियों की रौशनी में कमरे का संगीतमय वातावरण किसी महँगे होटल की शानदार पार्टी सरीखा लगने लगा था।
तुषार हौले-हौले पास आया और फिर एक घुटने को फर्श पर टिकाते हुए बैठकर बोला, “लीजिए, मिलिए बॉस से! ”
“बॉस ! आ गए क्या !” कहते हुए अंकिता ने दरवाजे की ओर नज़र डाली।
“जी हाँ बिग बॉस मिसेज़ अंकिता। मैडम, आज की न्यू इयर पार्टी आपके नाम!”
“तुषार, यह सब क्या है!” अंकिता हतप्रभ थी।
तुषार ने उसे कांधे से पकड़कर उठाया और अपने हाथ में उसका हाथ लेते हुए बोला, “अंकिता, बस ये समझ लो कि आज हमारे बीस साल पहले वाले दिन वापस आ गए हैं।”
“सचमुच?” अंकिता ने तुषार की आँखों में जैसे अपनी आँखें डाल दीं।
“हाँ अंकिता और मैं इन्हें फिर कभी जाने नहीं दूँगा।” तुषार के हाथों की गर्मी ने उन दोनों के दरम्यान जमीं बर्फ़ को पिघला दिया था। अंकिता भावावेश में तुषार से लिपट गई ।


मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

जरीब-करीब (लघुकथा)

“दीपा, हमें कल गाँव जाना होगा, अपने खेतों का हिस्सा-बाँटा करने के लिए।‘’
‘’क्यों ?’’
‘’पता चला है कि बड़े भैया हमारे हिस्से वाले खेतों की मिट्टी ईंट के भठ्ठे वालों को बेच रहे हैं।” मीता आवेश में बोली।
“ये तो गलत बात है, इससे तो हमारे खेत बंजर हो जाएँगे!... सच दीदी, पिताजी ने ताऊजी के परिवार के लिए इतना कुछ किया लेकिन उनके बेटे ने....” यह सुनकर दीपा भी भड़क उठी।
“ऐसा नहीं है दीपा। पिताजी ने बताया था कि ताऊजी ने खेतों में काम करके पिताजी को पढ़ाया। उन्हें कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी।”
“ठीक है, कम से कम उनके बेटे....।”
“…दीपा, वे हमारे बड़े भैय्या हैं...।” मीता ने दीपा को टोका।
“…तो हाँ, दीदी...बड़े भैय्या को यह तो सोचना ही चाहिए था कि खेतों में हमारा भी हिस्सा है।”
“बस, अब हम खेतों को यूँ बर्बाद नहीं होने देंगे। अपना हिस्सा अलग करवा कर किसी और को बटाई पर दे देंगे।”
अलगे दिन कार से मीता और दीपा गाँव के लिए रवाना हो गईं। दोपहर तक वे गाँव पहुँच गईं। बड़े भैय्या ने उन्हें स्थिति समझाने की कोशिश की। लेकिन उन दोनों ने जिद पकड़ ली कि नहीं हमारे खेत अलग कर दिए जाएँ, फिर उन्हें अपने खेतों के साथ जो करना हो वे करें।
थोड़ी देर बाद खेतों की नपाई शुरू हो गई। लेखपाल जरीब से नापकर खेतों में निशान लगवाने लगा। शाम होते-होते खेतों का बँटवारा हो गया।
“दीदी, यहाँ का काम तो हो गया। आगे का क्या प्लान है?”
“वापस चलते हैं। पर बहुत रात हो जाएगी...”
“ठीक है, रास्ते में किसी होटल में स्टे कर लेंगे।”
दोनों कार की तरफ़ बढ़ी ही थीं कि बड़े भैय्या की बेटी ने आकर कहा, “बुआ चलिए खाना खा लीजिये, मम्मी अंदर बुलाईं हैं।”
जब तक दोनों उससे कुछ कहतीं तभी एक और आवाज़ आई।
“राती में लौटब ठीक ना हव बच्ची। बिहाने जाया। तोहार लोगन के कमरा साफ़ करवा देले हई।”
दोनों चौंककर पलटीं। पीछे बड़े भैय्या खड़े थे। दोनों सकपका एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं। वे बड़े भैय्या के इस आग्रह को ठुकरा ना सकीं।
“क्या सोच रही हो दीदी?” रात को बिस्तंर में लेटे-लेटे छत ताकती मीता से दीपा ने पूछा।
“यही कि हमने शायद ठीक नहीं किया।‘’
‘’क्यों?’’
‘’अब देख न खेत तो बँट गए, लेकिन जो दिलों में बसे प्यार को बाँट दे ऐसी कोई जरीब नहीं बनी।”
“सच! एक बात कहूँ दीदी?”
“क्या?”
“यही कि क्यों न हम अपने खेत बड़े भैय्या को ही दे दें बटाई पर?”
मीता ने दीपा की ओर ऐसे देखा जैसे वह यही सुनना चाहती थी। मीता को लगा जैसे उन्होंने दिन में कोई अपराध किया था और अब उसके प्रायश्चित का तरीका मिल गया है।
उसने दीपा के गले में बाँह डाली और बोली,’’ चल सो जा, अब सुबह उठकर भैया से सबसे पहले यही बात करेंगे।‘’

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

परिवेश (लघुकथा)

“देखिये ये बच्चों की तस्वीरों का कोलाज उनके कमरों के लिए बनवाया है!’
“बहुत अच्छा है।”
“और ये हमारी तस्वीरों का कोलाज, अपने बेडरूम के लिए।”
“अरे वाह, ये वाली तब की है ना जब ईशा होने वाली थी?”
“नहीं, ये हमारी शादी की पहली सालगिरह की है।”
“अरे हाँ याद आया, तुम साल भर में एकदम गोला बन गई थीं न...” कहते हुए विशाल ने बाईं आँख दबा दी।
“जनाब, मैं गोला नहीं हुई थी समझे, वो साड़ी ही फूली-फूली थी।” रुठते हुए नीना ने विशाल की बाँह में चिकोटी काटी।
“हा हा हा, नाराज़ हो गई मेरी नीनू।” कहते हुए विशाल उसके नज़दीक सरक आया।
“हटिये, मुझे अभी बहुत काम है।” कहते हुए नीना तस्वीर लेकर बच्चों के कमरे में चली गई।
‘’ईशा, ये तेरी और आशू के बचपन की तस्वीरों का कोलाज है, ज़रा इस दीवार पर टंगवाने में मेरी मदद कर।” नीना बोली।
“लेकिन मम्मा, उस दीवार पर तो मैं कुछ और लगाऊँगी।”
“अरे तो उसके लिए बगल वाली दीवार हैं ना।”
“नहीं, उस दीवार पर तो इसे बिल्कुल भी मत लगाना।” आशू बोल पड़ा।
“क्यों, तुझे इससे क्या तकलीफ़ है?”
“मम्मा, वहाँ मैं अपने फ़ेवरेट फ़ुटबाल प्लेयर्स का पोस्टर लगाऊँगा।”
“और इस दीवार पर मैं अपने फ़ेवरेट मॉडल्स का पोस्टर लगाऊँगी।”
नीना अपने कमरे में आकर निढाल सी बेड पर बैठ गई। मानो उसके उत्साह रूपी गुब्बारे में किसी ने सुई चुभो दी हो। विशाल ने कनखियों से नीना को देखा। नीना के हाथ में तस्वीर देख उसने माज़रा भाँप लिया।
वह बोला, “नीना, वो मैं कह रहा था कि बच्चों की तस्वीरों वाला एक कोलाज अपने बेडरूम में भी होता तो अच्छा रहता।”
“उम्म....हाँ...शायद आप ठीक कह रहे हैं ।” नीना ने पैर के अंगूठे से फ़र्श कुरेदते हुए जवाब दिया।
“क्या हुआ?” विशाल उसके निकट आकर बैठ गया।
“कुछ नहीं।”
“देखो नीना, जब बच्चे बड़े होने लगते हैं तो उनका रहन-सहन, उनका पहनना-ओढ़ना उनके परिवेश के अनुसार ढलने लगता है। और ये होना भी चाहिए।”
“वो तो ठीक है, परन्तु ये तस्वीर उनका क्या बिगाड़ रही थी?”
“नीना, बात तस्वीर की नहीं है। यह पीढि़यों का अंतर है। उनकी पीढ़ी हमारी पीढ़ी से कुछ अलग सोचती है। क्या तुम चाहोगी कि इन छोटी-छोटी बातों को लेकर हमारे और बच्चों के बीच यह पीढि़यों का अंतर और बढ़े?”
“न ना, बिलकुल भी नहीं। मैं चाहती हूँ कि वे भी खुश रहें और हम भी।” नीना के अंदर जैसे चेतना लौट आई।
“ये हुई न बात, तो अब ये बताओ कि इस तस्वीर को कहाँ लगाना है?”
“एकदम हमारी नज़रों के सामने, उस दीवार पर।”
“ओके, योर हाइनेस।” विशाल ने इस अंदाज़ से सिर झुकाया कि नीना की सारी उदासी काफ़ूर हो गई।
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।

रविवार, 27 नवंबर 2016

‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ (लघुकथा)

“अरे, आपने अभी तक कुछ नहीं खाया?” घर आते ही जया ने डाइनिंग टेबल पर निगाह डालते हुए आरना से पूछा।

“-------------“

“आरना, मम्मा कुछ पूछ रही हैं न।”

“-------------“ आरना अनसुना कर रिमोट के बटन दबाती रही।

“ओ-ओ ! मेरी बेबी नाराज़ हो गई क्या ?” आरना को बाँहों में भरते हुए जया ने पुचकारा।

“मैं आपसे बात नहीं करूँगी।”

“मम्मा से बात नहीं करोगी, क्यों ?” जया ने उसको चूमते हुए पूछा।

“क्योंकि आप मुझे पार्क में खेलने नहीं जाने देती हो।”

“अरे, तो जब आपको खेलने के लिए टेरेस है, बालकनी है फिर पार्क में जाने की क्या ज़रूरत?”

“सब बच्चे पार्क में खेलते हैं, लेकिन आप मुझे टेरेस पर खेलने को बोलती हो।”

“वो इसलिए बोलती हूँ कि...कि...कि...” कहते हुए जया ने आरना के पेट में गुदगुदा दिया। आरना खिलखिलाकर हँस पड़ी।

“आप रेकेट लेकर टेरेस पर चलो, मम्मा अभी हाथ-मुँह धोकर आती है, फिर दोनों ख़ूब खेलेंगे, ओके !”

“ओके मम्मा, जल्दी आना।”

आरना को भेजकर जया हाथ-मुँह धोने लगी। आइने में चेहरा देखते हुए उसे ससुराल की याद हो आई।

“अविनाश, तुम्हें इस लड़की और हममें से एक को चुनना होगा।“

“पिता जी, आख़िर जया में क्या कमी है ?”

“कमी जया में नहीं, उसके स्टेटस में है।“

“मैं जया को नहीं छोड़ सकता।“

आरना के जन्म के बाद उसने अविनाश के चोरी-छिपे सास-ससुर को मनाने की नाकाम कोशिश की थी। अविनाश को जब यह बात पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ था। जब अविनाश का एक्सीडेंट हुआ था तो उसने उन्हें खबर करने को भी मना कर दिया। अविनाश चला गया।

“हा हा हा...दादू हार गए ! दादू हार गए !” आरना की आवाज़ ने उसे वर्तमान में ला खड़ा किया।

“दादू ! ये आरना किसे पुकार रही है ?” कहते हुए जया जल्दी-जल्दी टेरेस की सीढियाँ चढ़ने लगी।

“आरना !”

“मम्मा ! देखो मैंने दादू को हरा दिया !”

“मैं शिवाकांत हूँ। बगल वाले फ़्लैट में रहता हूँ।”

“आरना, बेटा अंकल को क्यों परेशान किया ? खेलने के लिए मम्मा आ रही थी ना।”

“खेलने दीजिये ना। मेरी पोती भी इसी के बराबर है। लेकिन...” कहते हुए शिवाकांत का गला भर्रा गया।

“क्या हुआ ?” जया ने प्रश्न किया।

“मेरे बेटे ने अमेरिका की सिटिज़नशिप ले ली है।”

“ओह !”

“वैसे तो अकेले समय काटने की आदत पड़ गयी है। लेकिन जब आपकी बच्ची को खेलते देखता हूँ तो अपने को रोक नहीं पाता।”

“ये आपको परेशान करती होगी ?” जया ने आरना का सिर सहलाते हुए पूछा।

“अरे नहीं बेटी, इसके साथ खेलने से मेरे घुटने दुरुस्त हो गए।”

शिवाकांत जी के मुख से 'बेटी' शब्द सुनकर जया जैसे अपनेपन के भाव से भर उठी. उसने झुक कर उनका चरण स्पर्श कर लिया।

शिवाकांत जी की आँखों से वात्सल्य छलक उठा. उन्होंने उसके सिर पर हाथ रख दिया।